Tuesday, 10 July 2012

हाँ किया प्यार मैंने ( कविता ) 12 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

                  हां किया प्यार मैंने ( कविता )

किया तो होगा ,
तुमने भी ,
कभी न कभी ,
किसी न किसी से प्यार।
धड़कता होगा ,
तुम्हारा दिल भी ,
देख कर किसी को ,
मुमकिन है ,
कर दिया हो तुमने ,
इज़हार मोहब्बत का ,
अथवा हो सकता है ,
रख ली हो ,
दिल की बात दिल में ,
समाज के डर से ,
या इनकार के  डर से।
मगर मैं जानती हूँ ,
ऐसा हुआ होगा ,
ज़रूर जीवन में एक बार ,
स्वाभाविक है ये ,
सभी को हो ही जाता है ,
एहसास प्रेम का।
आज जब मैंने ,
कर लिया ,
प्यार का एहसास ,
और कर दिया ,
परिणय निवेदन ,
करना चाहा ,
स्वयं को समर्पित ,
उसे जिसे चाहा ,
मेरे मन ने ,
तो क्यों ,
मान लिया गया ,
एक अपराध उसे।
क्यों दे दिया गया ,
मेरे पवित्र प्रेम की ,
भावना को ,
चरित्रहीनता का नाम।
क्या इसलिये ,
कि देना नहीं चाहता ,
पुरुष समाज ,
नारी को कभी भी ,
अधिकार चुनने का ,
पहल करने का ,
अधिकार नहीं है ,
औरत को ,
हर पुरुष चाहता है ,
नारी से मूक स्वीकृति ,
अथवा अधिक से अधिक ,
इनकार ,
वह भी शायद ,
क्षमा याचना के साथ।

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