Tuesday, 10 July 2012

चुभन ( कविता ) 11 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

धरती ने ,
अंकुरित किया ,
बड़े प्यार से उसे ,
किया प्रस्फुटित ,
अपना सीना चीर कर ,
बन गया धीरे धीरे ,
हरा भरा पौधा ,
उस नन्हें बीज से !
फसल पकने पर ,
ले गया काट कर ,
बन कर स्वामी ,
डाला था जिसने बीज ,
धरती में ,
और धरती को मिलीं ,
मात्र कुछ जडें ,
चुभती हुई सी !
अपनी कोख में ,
हर संतान को ,
पाला माँ ने , 
मगर मिला उन्हें सदा ,
पिता का ही नाम ,
जो समझता रहा खुद को ,
परिवार का मुखिया ,
घर का मालिक !
और हर माँ ,
सहती रही ,
कटी हुई जड़ों की ,
चुभन के  दर्द को ,
जीवन पर्यन्त !

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