Tuesday, 24 July 2012

ग़ज़ल 1 5 0 ( रहें खामोश जब तक सब कहा जाता शराफत है )

रहें खामोश जब तक सब कहा जाता शराफत है ,
कभी जब बोलता कोई उसे कहते बगावत है  !
खुदा देता नहीं क्योंकर सभी को सब बराबर है ,
कभी खुद देखता आकर किसे कितनी ज़रूरत है !
नहीं उनकी खता कोई हुई जिनको मुहब्बत है ,
कभी पूछो ज़माने से , उसे कैसी अदावत है  !
यहीं सब छोड़ना होगा सभी कुछ जोड़ने वाले ,
न जाने नाम पर किसके लिखी तुमने वसीयत है  !
मिटा डाला सभी ने खुद कभी का नाम तक उसका ,
मुहब्बत मांगते सब लोग कब मिलती मुहब्बत है  !
किसे फुर्सत यहाँ सोचे वतन कैसे बचेगा अब ,
सभी कुछ है उन्हीं का अब सियासत बस तिजारत है !
हसीनों की अदाओं को कहाँ समझा कभी कोई ,
दिखाना भी छुपाना भी यही उनकी नज़ाकत है  !
नहीं हिन्दू यहाँ कोई नहीं मुस्लिम यहाँ कोई ,
यहाँ होती धर्म के नाम पर केवल सियासत है  !
पिलाते और पीते हैं बड़े ही शौक से "तनहा" ,
जिसे जीना वो कहते हैं वही शायद कयामत है  !

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