Monday, 23 July 2012

ग़ज़ल 1 4 9 ( नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई ) - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई

नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई  ,
है अपनी जेब तक खाली कहीं पर घर नहीं कोई।
चले थे सोच कर कोई हमें उसका पता देगा  ,
यहाँ पूछा वहां ढूँढा मिला दिलबर नहीं कोई।
बताना हुस्न वालों को जिन्हें चाहत है सजने की ,
मुहब्बत से हसीं अब तक बना जेवर नहीं कोई।
ग़ज़ल की बात करते हैं ज़माने में कई लेकिन ,
हमें कहना सिखा देता मिला शायर नहीं कोई।
हमें सब लोग कहते थे कभी हमको बुलाना तुम ,
ज़रूरत में पुकारा जब मिला आ कर नहीं कोई।
कहीं मंदिर बना देखा कहीं मस्जिद बनी देखी ,
कहाँ इन्सान सब जाएँ कहीं पर दर नहीं कोई।
वहां करवट बदलते रात भर महलों में कुछ "तनहा"
यहाँ कुछ लोग सोये हैं जहाँ बिस्तर नहीं कोई।

No comments: