Monday, 23 July 2012

ग़ज़ल 1 4 9 ( नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई )

नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई  ,
है अपनी जेब तक खाली कहीं पर घर नहीं कोई  !
चले थे सोच कर कोई हमें उसका पता देगा  ,
यहाँ पूछा वहां ढूँढा मिला दिलबर नहीं कोई   !
बताना हुस्न वालों को जिन्हें चाहत है सजने की ,
मुहब्बत से हसीं अब तक बना जेवर नहीं कोई  !
ग़ज़ल की बात करते हैं ज़माने में कई लेकिन ,
हमें कहना सिखा देता मिला शायर नहीं कोई  !
हमें सब लोग कहते थे कभी हमको बुलाना तुम ,
ज़रूरत में पुकारा जब मिला आ कर नहीं कोई  !
कहीं मंदिर बना देखा कहीं मस्जिद बनी देखी ,
कहाँ इन्सान सब जाएँ कहीं पर दर नहीं कोई  !
वहां करवट बदलते रात भर महलों में कुछ "तनहा"
यहाँ कुछ लोग सोये हैं जहाँ बिस्तर नहीं कोई  !

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