Sunday, 8 July 2012

ग़ज़ल 1 4 3 ( बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते ) डॉ लोक सेतिया

बिका ज़मीर कितने में ,हिसाब क्यों नहीं देते ,
सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते  !
किसी ने घर जलाया था , उसी से जा के ये पूछा ,
जला के घर हमारा आप आब क्यों नहीं देते  !
सभी यहाँ बराबर हैं सभी से प्यार करना तुम ,
सबक लिखा हुआ जिसमें किताब क्यों नहीं देते  !
छुपा नहीं छुपाने से हुस्न कभी भी दुनिया से ,
हसीं सभी हटा अपना हिजाब क्यों नहीं देते  !
नहीं भुला सके हम खाव्ब जो कभी सजाये थे ,
हमें वही सुहाने फिर से ख्वाब क्यों नहीं देते  !
इश्क यहाँ सभी करते , नहीं बचा कभी कोई ,
न बच सका किसी का दिल जनाब क्यों नहीं देते !
यही तो मांगते सब हैं हमें भी कुछ उजाला दो ,
नहीं कहा किसी ने आफताब क्यों नहीं देते  !
अभी तो प्यार का मौसम है और रुत सुहानी है ,
कभी किसी हसीना को गुलाब क्यों नहीं देते  !
उन्हें अभी बता देना यही गिला है "तनहा" को ,
हमें कभी सभी अपने अज़ाब क्यों नहीं देते  !

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