Thursday, 26 July 2012

ग़ज़ल 1 3 ( हमको ले डूबे ज़माने वाले ) लोकप्रिय रचना

हमको ले डूबे ज़माने वाले ,
नाखुदा खुद को बताने वाले !
देश सेवा का लगाये तमगा ,
फिरते हैं देश को खाने वाले !
ज़ालिमों चाहो तो सर कर दो कलम ,
हम न सर अपना झुकाने वाले !
उनको फुटपाथ पे तो सोने दो ,
ये हैं महलों को बनाने वाले  !
तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ,
मेरी अर्थी को उठाने वाले  !
तेरी हर चाल से वाकिफ़ था मैं ,
मुझको हर बार हराने वाले  !
मैं तो आइना हूँ बच के रहना ,
अपनी सूरत को छुपाने वाले  !

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