Thursday, 26 July 2012

ग़ज़ल 0 6 ( ख़ुदकुशी आज कर गया कोई )

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ,
ज़िंदगी तुझ से डर गया कोई !
तेज़ झोंकों में रेत के घर सा ,
ग़म का मारा बिखर गया कोई !
न मिला कोई दर तो मज़बूरन ,
मौत के द्वार पर गया कोई  !
खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर ,
फिर से खुद ही संवर गया कोई  !
ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है ,
उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई  !
और गहराई शाम ए तन्हाई ,
मुझको तनहा यूँ कर गया कोई !
है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक" ,
जीते जी कब से मर गया कोई  ! 

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