Thursday, 26 July 2012

ग़ज़ल 0 6 ( ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ) लोक सेतिया "तनहा"

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई 

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ,
ज़िंदगी तुझ से डर गया कोई।

तेज़ झोंकों में रेत के घर सा ,
ग़म का मारा बिखर गया कोई।

न मिला कोई दर तो मज़बूरन ,
मौत के द्वार पर गया कोई।

खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर ,
फिर से खुद ही संवर गया कोई।

ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है ,
उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई।

और गहराई शाम ए तन्हाई ,
मुझको तनहा यूँ कर गया कोई।

है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक" ,
जीते जी कब से मर गया कोई।  

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