Friday, 6 July 2012

औरत ( कविता ) 0 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

 औरत    ( कविता )

तुमने देखा है
मेरी आँखों को
मेरे होटों को
मेरी जुल्फों को
नज़र आती है
तुम्हें 
ख़ूबसूरती
नज़ाकत
और कशिश
मेरे जिस्म के
अंग अंग में ।
तुमने देखा है 
केवल बदन मेरा 
प्यास बुझाने को 
अपनी हवस की
बाँट दिया है तुमने
टुकड़ों में मुझे
और उसे दे रहे हो 
अपनी चाहत का नाम।

तुमने देखा ही नहीं
कभी
उस शख्स को 
एक इन्सान है जो 
तुम्हारी तरह 
जीवन का एहसास लिये 
जो नहीं है
केवल एक जिस्म 
औरत है तो क्या।

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