Friday, 6 July 2012

नयी कविता ( कविता ) 0 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

              नई कविता
दुनिया के लोग ,
अपने भी ,
बेगाने भी ,
आते रहते हैं ,
जाते रहते हैं
प्रतिदिन ,
घटती रहती हैं घटनाएं ,
निरंतर ,
घूमता रहता है ,
वही चक्र ,
किसे क्या पसंद है ,
क्या नापसंद
इस बात से ,
होता नहीं ,
किसी को सरोकार ,
कभी बन के दर्शक ,
देखते हैं तमाशा ,
कभी स्वयं ,
बन जाते हैं ,
तमाशा भी ,
तमाशाई भी ,
हर दिन ,
इस कोलाहल में ,
शामिल रहता हूँ ,
मैं भी चाहे अनचाहे ,
हर साँझ चाहता हूँ ,
भुला दूँ वो सब बातें ,
अच्छी बुरी ,
दिन भर की ,
सो जाता हूँ ,
बिस्तर पर अकेला ,
रात भर ,
बदलता रहता हूँ करवटें ,
ऐसे में ,
लगता है मुझे ,
हर रात्रि ,
सो गया है ,
कोई मेरे करीब आ कर ,
प्यार से थपथपा रहा है मुझे ,
पल पल रहता है ,
इक मधुर सा एहसास ,
किसी के पास होने का ,
बीत जाती है ,
हर रात  यूँ ही ,
देखते हुए नये स्वप्न ,
आ जाती है ,
नयी सुबह ,
हर रात्रि के बाद ,
भोर के उजाले में ,
ढूंढता हूँ मैं उसे ,
जो था ,
रात्रि भर पास मेरे ,
और मिल जाती है ,
हर सुबह मुझे ,
तकिये के नीचे ,
इक नयी कविता।

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