Thursday, 5 July 2012

कैद ( कविता ) 0 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कब से जाने बंद हूं ,
एक कैद में मैं ,
छटपटा रहा हूँ ,
रिहाई के लिये।

रोक लेता है हर बार मुझे  ,
एक अनजाना सा डर ,
लगता है ,
एक सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये।

मगर जीने के लिए ,
निकलना ही होगा ,
कैद से मुझको।

कर पाता नहीं ,
बाहर निकलने का ,
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं  ,
मैं केवल सपने ,
कि आएगा कभी ,
मसीहा कोई ,
मुझे मुक्त कराने  ,
खुद अपनी ही कैद से।