Thursday, 5 July 2012

कैद ( कविता ) 0 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कब से जाने ,
बंद हूं ,
एक कैद में मैं ,
छटपटा रहा हूँ ,
रिहाई के लिये !
रोक लेता है ,
हर बार मुझे  ,
एक अनजाना सा डर ,
लगता है ,
एक सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये  !
मगर ,
जीने के लिए ,
निकलना ही होगा ,
कैद से मुझको,
कर पाता नहीं ,
बाहर निकलने का ,
कोई भी मैं प्रयास !
 देखता रहता हूँ ,
मैं केवल सपने ,
कि आएगा कभी ,
मसीहा कोई ,
मुझे मुक्त कराने  ,
खुद अपनी ही कैद से !!

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