Thursday, 5 July 2012

साया ( कविता ) 0 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

पी लेता हूँ ,
यूँ तो अक्सर ,
ज़िंदगी का ,
मैं ज़हर !
जाने क्यों ,
फिर भी कभी ,
भर आती हैं ,
आँखें ,
और घुटने ,
लगता है दम !
रोकने से ,
तब रुकते ,
नहीं आंसू ,
मन करता है ,
जा कर ,
पास तुम्हारे ,
जी भर के ,
रो लेने को !
सोचता हूँ ,
मैं कभी कभी ,
जिसकी ,
तलाश है मुझे ,
तुम वही हो कि नहीं  !
भीगी पलकों के ,
इस नाते को ,
मैं नहीं कोई ,
नाम दे पाया  !
तुम्हें भी ,
याद आता है कभी ,
छत के कोने में ,
देर रात तक ,
राह तकता हुआ ,
गुमसुम सा खड़ा ,
कोई साया !

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