Wednesday, 4 July 2012

मुझे लिखना है ( कविता ) 0 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मुझे लिखना है  ( कविता )
कोई नहीं पास तो क्या ,
बाकी नहीं आस तो क्या।
टूटा हर सपना तो क्या ,
कोई नहीं अपना तो क्या।
धुंधली है तस्वीर तो क्या ,
रूठी है तकदीर तो क्या।
छूट गये मेले तो क्या ,
रह गये अकेले तो क्या।
बिखरा हर अरमान तो क्या ,
नहीं मिला भगवान तो क्या।
है ऊँची दीवार तो क्या ,
मिला नहीं प्यार तो क्या।
हैं कठिन राहें तो क्या ,
दर्द भरी हैं आहें तो क्या।
सीखा नहीं कारोबार तो क्या ,
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या।
जीवन इक संग्राम तो क्या ,
नहीं पल भर आराम तो क्या।
मैं लिखूंगा नयी इक कविता ,
प्यार की  और विश्वास की ,
लिखनी है कोई कहानी मुझको ,
दोस्ती की और अपनेपन की ,
मुझे है अब जाना वहां ,
मिल सके सब कुछ जहाँ ,
खुशियाँ ही खुशियाँ हों बस ,
खिलखिलाती मुस्कानें हों ,
खिले हों फूल ही फूल  ,
हर तरफ हों बहारें ही बहारें ,
लिखना है वो सब खुद मुझे ,
जो लिखा नहीं मेरे नसीब में।

No comments: