Sunday, 24 June 2012

ग़ज़ल 1 डॉ लोक सेतिया - ( किसे हम दास्ताँ अपनी सुनायें ) मेरी पहली ग़ज़ल - 1

किसे हम दास्ताँ अपनी सुनायें  ,
कि अपना मेहरबां किसको बनायें !
कभी तो ज़िंदगी का हो सवेरा ,
डराती हैं बहुत काली घटायें !
यहाँ इन्सान हों इंसानियत हो,
नया मज़हब सभी मिलकर चलायें !
सताती हैं हमें तन्हाईयां अब,
यहाँ परदेस में किसको बुलायें   !
हमारा चारागर जाने कहाँ है,
कहाँ जाकर ज़ख्म अपने दिखायें  !
जिन्हें जीना ही औरों के लिए हो ,
बताओ फिर ज़हर कैसे वो खायें  !
चमकती है शहर में रात "तनहा" ,
अँधेरे गावं इक दिन जगमगायें !

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