Friday, 22 June 2012

ग़ज़ल 1 4 8 ( ढूंढते हैं मुझे मैं जहाँ नहीं हूँ ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं  ,
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं ,
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं । 
मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में ,
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।  
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को ,
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं । 
गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर ,
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं । 
आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों ,
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं । 
लोग "तनहा" मुझे देख लें कभी भी ,
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं। 
    (  खुदा , ईश्वर , परमात्मा , इक ओंकार , यीसु )

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