Monday, 11 June 2012

ग़ज़ल 1 4 6 ( कहीं अल्फ़ाज़ सारे खो गये हैं ) डॉ लोक सेतिया

कहीं अल्फाज़ सारे खो गये हैं ,
तभी खामोश लब सब हो गये हैं !
तड़पते ही रहे सारी उम्र जो ,
जगाना मत उन्हें  अब सो गये हैं !
अदीबों में  नहीं कोई भी उनसा ,
चढ़ाये रोज़ सूली वो गये हैं !
सुनाने दास्ताँ अपनी लगे जब ,
नहीं कुछ कह सके बस रो गये हैं !
अगर है होसला  करना मुहब्बत ,
लुटे सब इस गली में जो गये हैं  !
उन्हें फिर भी नहीं रोटी मिली है ,
जो सर पर बोझ सबका ढो गये हैं !
यहाँ कुछ फूल आंगन में उगाते ,
ये कैक्टस  किसलिये सब बो गये हैं !
नहीं जाते रकीबों के घरों में ,
जहाँ जाना नहीं था , लो गये  हैं !
मनाते और "तनहा" मान जाते ,
नहीं फिर क्यों मनाने को गये हैं  !

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